राधा-राधा रटते हैं हम…
कृष्ण के प्रेम रंग में रंगे हैं…..
मानो जैसे हम तो हमारे सखा को ही राधा मान बैठे हैं….
उनके कमल रूपी चरणों में खुद को बैठा मान कर हमने खुद को सुरक्षित पाया है….
हमारे लिए तो क्या राम और क्या श्याम हमने तो अपने सखा में सब कुछ पाया है….
उनका साथ पाकर हमने दुख में भी खुद को सुखी पाया है…
जब-जब भटके हैं हम, जब-जब खुद को दूर पाया है,
तब-तब हमने खुद को सखा के और करीब पाया है…
दूरियाँ करनी चाहीं, हमने खुद को दूर करना चाहा

तब-तब हमारे सखा ने हमारा हाथ थाम हमें समझाया है….
ढूंढ़ रहे थे प्रेम उनका, फिर हमने आंखों से छलकते प्रेम रूपी आंसुओं में उनका प्रेम पाया है….
सोचते थे मिल गया यह खाना भी हमारे कर्मों से लेकिन
यह भी उनके प्रेम की वजह से आया है….

सोचते थे ये हमारी चीजें हैं, फिर हमने यह चीजें भी उनकी
पाई हैं…..
बात आई जब खुद की, तो याद आया

यह आत्मा रूपी
अंश भी उनसे पाया है…
फिर हमने सब कुछ उन्हें समर्पित कर उन्हें पाया है…..
दुख के गिरते आंसू, हमारी पीड़ा और हमारे दुःख को वे भी कहाँ देख पाए हैं?”
दुख में भी हमारी हिम्मत बन कर उन्होंने साथ निभाया है….
मानो जैसे हमने तो सब ज्ञान उनसे पाया है….
हमने तो गुरु भी उन्हें ही बनाया है….
खैर, ये शब्द भी हमारे कहाँ ये शब्द भी उनसे ही पाए हैं….

✍️…. प्रेमाध्रा