साथ आपका, सखा भी आप हैं,
भटकता ये भक्त आपका है…
और ये लौट कर आता ये भक्त भी आपका है…
धर-धर ठोकरें खाता, लाख समझाने पर भी क्यों समझ
नहीं आता है…
आपकी शरण में ये सुख पाता है,
आपमें ही खो जाता है….
आपसे ही आती हैं बातें ज्ञान की…
तो आपसे ही कर्तव्य का बोध हो पाता है….
आपकी शरण में रख लो ना सखा,
ये भक्त आपके बिना भटक सा जाता है…
ये माया के प्रभाव में आपको ही भूल जाता है….
रख भी लो ना अपनी शरण में,
आपकी शरण में ये निडर हो जाता है…
आपसे ही ये भक्त भक्ति कर पाता है,
आपसे ही ये भक्त भक्ति पाता है….
आपके बिना ये भक्त शक्तिहीन हो जाता है…
आपके बिना ये भक्त भक्ति भी भूल जाता है….
आपकी शरण में रहकर ये भक्त सुरक्षा पाता है….
आपके बिना ये अहंकारी हो जाता है….
आपका साथ हो तो ये मन शुद्ध हो जाता है….
आपके बिना ये भक्त नहीं रह पाता है….
आपसे दूर होकर ये भक्त सब जानकर भी अंजान हो जाता है….
आपसे दूर क्या होता है- ये तो सखा कौन है, ये भी भूल जाता है…
ये मन फिर इसे खूब नचाता है…
रख भी लो न सखा, इस भक्त को अपनी शरण में…
ये सिर्फ आपकी भक्ति में नाचना चाहता है….
आपसे दूरी पाकर ये भक्त सब कुछ भूल जाता है…..
रख भी लो ना सखा अपनी शरण में-
आपके बिना ये भक्त खुद को एक बिंदु समान भी नहीं पाता है…
आपके बिना ये भक्त खो जाता है…
सत्य और भ्रम में भेद नहीं कर पाता है….
रख भी लो न सखा, इसे अपनी शरण में…
आपका साथ हो तो कुछ ना होकर भी मानो सब कुछ
मिल जाता है…
मानते हैं – कुछ भी नहीं आपके सामने, ये भक्त
आपका…
मानते हैं – कर देता है भूल ये भक्त आपका….
रख भी लीजिए न सखा, इसे अपनी शरण में…
आपसे दूर, ये जानकर भी सब कुछ भूल कर जाता है…
भटक जाएगा ये भक्त आपका….
अब थाम भी लो ना हाथ, सखा – नहीं जी पाएगा ये
भक्त आपका…
पता नहीं कितने जन्मों बाद, इस जन्म में जाना है सत्य
आपका…
नहीं जानता था ये भक्त आपका…
अब रख भी लीजिए न हमेशा के लिए इस भक्त को
अपनी शरण में….
टूट जाएगा सखा – आपके बिना ये भक्त आपका…
न भक्ति मेरी है, न प्रेम मेरा है…
न मेरे ये रिश्ते हैं…
न दुःख मेरा है…
न सुख मेरा है…
न ये सफलता मेरी है, न ये असफलता मेरी है….
न ये शरीर मेरा है, न ये बुद्धि मेरी है….
नये संसार मेरा है, न ये भावना मेरी…
जो कर सकूँ मैं सही-गलत में भेद – वह हक भी मेरा नहीं
है….
न कलम मेरी, न विचार मेरे, न ये भजन मेरे हैं…
न ये आँखों में बहते प्रेम के आँसू मेरे हैं…
न कर्तव्य का बोध मेरा था, न पढ़ने वाली मैं थी…
न ये दोस्त मेरा, न ये माता-पिता मेरे हैं….
नये रूप मेरा है, न ये शरीर मेरा है….
ये दिखती आस-पास की चीजें मेरी… ख़ैर, ये भी मेरी
नहीं हैं…..
ये सब तो उनकी देन है…
ये भक्त कर रहा याद – जिनको कर रहा है समर्पित सब
कुछ…
बस वही भक्त के हैं – बाकी सब कुछ तो उनका है।
✍️…. प्रेमाध्रा
